Romantic poem - ख़ामोशी तोड़ो मोहतरमा...

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By Usman Khan

ख़ामोशी तोड़ो मोहतरमा कुछ बात करो, चलो मेरा नाम पूछकर ही शुरआत करो !

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ये लम्बा सफर कट जायेगा यूहीं चुटकियों में, कुछ हम पूछे कुछ तुम भी सवालात करो !

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क्या कहा तुम भी मेरे शहर से हो, हाय, आप किसी रोज़ चाय पर मुलाकात करो !

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घबराओ मत मेरा अंदाज़ दोस्ताना है बस, दिल खोलो तुम भी लफ्ज़ो की बरसात करो !

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चुरा लो कोई पल मेरी ज़िंदगी से यूँ, तुम मेरे नाम कुछ हसीं लम्हात करो !

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पसंद आए 'राही' तो गुफ्तगू को बढ़ाना, कोई जबरदस्ती नहीं की तुम कलामात करो !

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