Urdu love poetry  - सच्चे आशिक़ की जुबानी! - डायरी की शायरी

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मैं जब तक अपनी ज़िंदगी नहीं बनाऊँगा तब तक तुम्हें अपनी नहीं बनाऊँगा !

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हीरे बनाऊँगा ताकि गुज़ारा हो सके पर उनमे से किसी को भी बेशक़ीमती नहीं बनाऊँगा !

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गहने बनाऊँगा तरह तरह के ढेर सारे पर कभी तेरे लिए कोई अंगूठी नहीं बनाऊँगा !

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वो जगह सितारों की है सिर्फ़ सितारों की लिहाज़ा तेरे माथे पर कोई बिंदी नहीं बनाऊँगा !

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उसे पानी से डर लगता है सो अपनी दुनिया में मैं झील तालाब समंदर नदी नहीं बनाऊँगा !

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वो जानती है कि मैं सबकुछ बना सकता हूँ मैं जानता हूँ कि मैं कुछ भी नही बनाऊँगा !

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shayari by Daastan - E - ashiquee

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