Mirza Ghalib shayari on love - जला है जिस्म जहाँ दिल भी...

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Credit: Mirza Ghalib

तोहमते तो लगती रही रोज़ नयी नयी हम पर मगर जो सबसे हसीं इलज़ाम था वह तेरा नाम था ! ~ Mirza Ghalib

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इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के ! ~ Mirza Ghalib

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तोड़ा कुछ इस अदा से ताल्लुक उसने ग़ालिब, कि हम सारी उम्र अपना क़ुसूर ढूँढ़ते रहे। ~ Mirza Ghalib

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मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले! ~ Mirza Ghalib

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले। बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। ~ Mirza Ghalib

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दर्द देकर सवाल करते हो। तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो।

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देखकर पूछ लिया हाल मेरा। चलो कुछ तो ख़याल करते हो ! ~ Mirza Ghalib

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हम भी दुश्मन तो नहीं है अपने ग़ैर को तुझसे मोहब्बत ही सही ! ~ Mirza Ghalib

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वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है। कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते है। ~ Mirza Ghalib

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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा। कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है। ~ Mirza Ghalib

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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है। तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है। ~ Mirza Ghalib

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लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब” हम तुम को याद करते है सीधी सी बात है। ~ Mirza Ghalib

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