Gam bhari shayari shayari hindi by Fahad Guest writer of डायरी की शायरी 

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तबियत रहती है आज कल मेरी कुछ परेशां जाना, लगता है कुछ सांसों का और हूं मैं मेहमा‌ं जाना,

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अजीब कैफियत है जिसमें मुबतला हूं मैं, कि अंदर शोर ही शोर है और खामोश है ज़ुबां जाना,

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जो भी सजाए थे मैंने फूल वो सब झड़ चुके, कुछ इस तरह से हुआ वीरान कल्ब-ए-गुलिस्तां जाना,

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पढ़ गए हैं मेरे पैरों में छाले चलते-चलते, मगर अफसोस कि अब तक नहीं मिला मेरा मकां जाना,

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अंधेरा ही अंधेरा है अब मेरी जिन्दगी में बाकी, एक मुददत गुजरी कोई नही आया करने चरागां जाना,

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वो जो सजाए थे ख़्वाब चश्म-ए-दाश्त में मैंने, ऐसे बिखरे हैं जैसे रेत का कोई आशियां जाना,

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किस से सहारा माँगू, किसको अब लगाऊं आवाज़, कितना बोझल बन गया है यह नाकामियों का सामां जाना,

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अब आगे का सफर तन्हा ही तय करना है तुझको फहद, मंजिल तक जायेंगे फक़त तेरे कदमों के निशां जाना।

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